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इलाज के लिए ‘अमरीका’ भी करता है बंधुआ मजदूरी

Bonded labor for health

लखनउ से तकरीबन 100 किलोमीटर दूर सीतापुर के पगरोर्इ गांव में रहने वाले अमरीका प्रसाद दिसम्बर की 19 तारीख से किंग जौर्ज मेडिकल कालेज में डेरा जमाये हुए हैं। न्यूरोलौजी डिपार्टमेंट के ठीक बाहर कड़कड़ाती ठंड में अपने पूरे परिवार के साथ वो बस इसी उम्मीद में बैठे हैं कि उनकी 10 महीने की बेटी का इलाज हो जाये। “बच्ची बीमार है। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहा कि अभी छुटटी पे जा रहे हैं। 14 जनवरी के बाद आना।” ये कहते हुए अमरीका प्रसाद की नाउम्मीदी साफ ज़ाहिर हो जाती है।

80 साल के अपने पिता शिवदयाल और अपनी पत्नी के साथ यहां आये अमरीका प्रसाद, ओढ़ने के लिये कम्बल, चटार्इ, खाने पीने का कुछ सामान, कुछ बरतन और पैटोमैक्स साथ लाये हैं। कड़कड़ाती ठंड में खुले आसमान के नीचे अस्पताल में ही अपना अस्थार्इ घर जमा चुके अमरीका प्रसाद बताते हैं “डाक्टर ने कहा था कि इलाज में 22 हज़ार रुपये तक का खर्चा आएगा। इतना हम कहां से लाते। बीपीएल कार्ड की अर्जी़ दी है, हौसिपटल वाले कहते हैं जब दवा आएगी तभी इलाज हो पाएगा। “

अपने गांव पगरोर्इ में काश्तकारों के लिये मजदूरी करके रोजी रोटी कमाने वाले अमरीका अपनी बच्ची के इलाज के लिये बड़े काश्तकारों से उधार लेकर यहां आये हैं। दो भार्इ और पिताजी सब मिलकर गांव में मजदूरी करते हैं। “इलाज के लिए बड़े काश्तकारों से 20 प्रतिशत के ब्याज पर पैसा मांग के लाए हैं। इसका इलाज हो जाएगा तो फिर उनके यहां काम करके पैसा चुकाएंगे।” अमरीका के बुजुर्ग पिता शिवदयाल अपनी नातिनी की तरफ निराशा से देखते हुए कहते हैं।

इलाज के लिए बंधुआ मजदूरी करने को मजबूर अमरीका प्रसाद का परिवार अकेला नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2012 में जारी की गर्इ एक रिपोर्ट के मुताबिक देश की 60 फीसदी जनसंख्या इलाज के लिये अपनी हैसियत से कर्इ गुना ज्यादा खर्च करने को मजबूर है। रिपोर्ट ये भी बताती है कि देश की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते देश में 390 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे आ जाते हैं। ग्रामीण भारत का हाल और भी बुरा है। गरीबी के चलते गांवों के 30 फीसदी लोग अपनी और अपने रिश्तेदारों की बीमारियों का इलाज ही नहीं करवा पाते।

किंग जौर्ज मेडिकल कौलेज में मुख्य चिकित्सा निरीक्षक एस एन शंखवाल गांव कनेक्शन से की गर्इ बातचीत में बताते हैं “यहां हर रोज पांच हज़ार से ज्यादा मरीज़ आते हैं। उनके लिये 350 के लगभग चिकित्सकों की व्यवस्था है। समस्या ये है कि प्राथमिक स्तर पर जो स्वास्थ्य सुविधाएं हैं वो पर्याप्त नहीं हैं। इसीलिये मेडिकल कॉल में भीड़ बहुत ज्यादा है। अगर पीएचसी वगैरह में मौजूद संसाधनों को और मजबूती दी जाये तो हालात बेहतर हो सकते हैं।”

विश्वबैंक की रिपोर्ट देश में स्वास्थ्य को लेकर सरकार की उपेक्षा की कहानी कहती है। साल 2009 में स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च में से सरकार द्वारा किया गया खर्च महज 30 फीसदी था। उस साल सरकारी बज़ट में से स्वास्थ्य पर केवल 3.7 फीसदी खर्च किया गया।

ये आंकड़े साफ करते हैं कि आम आदमी को अपने स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च में से 70 फीसदी का बोझ खुद उठाना पड़ता है।

रायबरेली के लालगंज से आये गोपाल सिंह की 53 साल की मां रामदुलारी अस्पताल में एडमिट हैं। मां के इलाज में आ रहे भारी खर्च से परेशान गोपाल कहते हैं “फतेहपुर के भगवती नर्सिंग होम में  2 दिन के लिये रखा। वहां 17 हज़ार रुपये का खर्चा हुआ पर कोर्इ फायदा नहीं। एक दिन का पांच हज़ार रुपये केवल रहने का लिया। फिर जिला हासिपटल रार्इबरेली जाने को कह दिया। तब से केवल सांसें चल रही हैं। शरीर में कोर्इ फंक्शन नहीं हो रहा। यहां आने में 1100 रुपये लगे।  बस दो दिनों में 7 हज़ार रुपये खर्च हो चुके हैं।”

सार्वजनिक क्षेत्र में गरीब आदमी के स्वास्थ्य के लिए सरकार की जो योजनाएं हैं भी उनका लाभ भी पूरी तरह उनको नहीं मिल पाता। तभी तो 120 किलोमीटर का सफर तय कर फैजाबाद से लखनउ आये घनश्याम कहते हैं “हमारे पास बीपीएल कार्ड है। सुना था बीपीएल कार्ड वालों का मुफत में इलाज होता है। लेकिन पिछले पन्द्रह दिनों से चक्कर लगा रहे हैं। एडमिट कराने जाओ तो कहते हैं डाक्टर से लिखवा के लाओ और डौक्टर से लिखवाने जाओ तो वो कहते हैं पहले एडमिट होकर आओ। गरीब आदमी की कोर्इ सुनवार्इ नहीं होती।”

 

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