ताज़ा रेजगारी

इफरात

काश मैं जीता कुछ दिन
कुछ न होने के लिए।
कुछ बनने की शर्त को
प्याज के छिलके के साथ
फेंक आता कूड़ेदान में।
और निश्चिंत होकर
लगाता,
सूरज में रोशनी का अनुमान।
रोश नी को भरकर बाल्टी में
उड़ेल आता
दीवार पर बनी
अपनी ही परछाई पर
और देखता उसे
सुनहला होते।
हवा के बीच कहीं ढ़ूंढ़ता फिरता
बेफिक्र अपने गुनगुनाये गीत
और सहेज लेता कुछ चुने हुए षब्द
अपनी कविता के लिए।
मैं आइने में खुद को देखता
कुछ न होते हुए
और बिखर जाता
जैसे हवा बिखर जाती है
मन माफिक।
आइने में सिमट जाता
ओस की बूंदों सा
और बदल जाता आईना
दूब के खेत में।
मेरी आंख बंद होती
मुठठी की तरह
और जब हथेली खुलती
वो समय होती
बिखर जाती खेतों में
इफरात से।

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