ताज़ा रेजगारी

आज का समाज और जनआन्दोलन

रंजना कुमारी ,निदेशक, सेन्टर फार सोशल रिसर्च
लोकतंत्र में जनआन्दोलनों की भूमिका काफी अहम रही है। यह भूमिका आज के दौर में बढ़ गई है। आज समाज का गरीब तबका कमजोर है। जन आन्दोलन ही सरकार और बाजार के बीच उलझे आम जन के मुददों को उठा सकते हैं। आज मानवाधिकार, महिलाओं से जुड़े मुददे समाज में सबसे ज्यादा जरुरी दिखई दे रहे हैं। राजनीति का स्वरुप जनमुखी नहीं रह गया है जिस वजह से ये मुददे कहीं दब से गये हैं। एक दौर में जेपी आन्दोलन सरीखे जन आन्दोलन होते थे। मैं खुद इस आन्दोलन की उपज रही हूं। हम लोग सड़कों पर उतरे, जेल गये। लेकिन आज की परिस्थिति में आन्दोलनों का स्वरुप बदल गया है। आन्दोंलनों में बिखराव की स्थिति आ गई है।,इसके कई कारण हैं। आर्थिक अभाव के कारण जनआन्दोलनों में संसाधन जुटाने की ताकत नहीं रही। आन्दोलनों के विभाजन के पीछे एक कारण और है नेताओं के निजी स्वार्थ। नेता अपने आन्दोलन को तो बड़े जोर शोर से उठाते हैं लेकिन दूसरों के आन्दोलनों को तोड़ने की कोशिश करते हैं। इस कारण साझे आन्दोलनों की बात बेमानी सी हो जाती है। कुशल नेतृत्व का अभाव भी आन्दोलनों के विभाजित होने की बड़ी वजह है। आज के राजनीतिज्ञ जनता से अलग हो गये हैं। जिससे उनकी विश्वसनीयता में कमी आई है। लगता है कि नेताओं को अब जनता के सुख दुख, उनकी समस्याओं से कोई लेना देना ही नहीं रहा। जनआन्दोलन करने वालों के पास ताकत नहीं है। सारी ताकत राज्य के हाथ में है। नीति निर्माण हो या उनका कार्यान्वयन जनता को इसके लिये सरकार के सामने ही हाथ फैलाने पड़ते हैं परिणाम स्वरुप आन्दोलनकारियों को भी अपनी मांगें मनवाने के लिए सरकार के सामने समझौता करना पड़ता है। इस तरह आन्दोलन कमजोर पड़ जाते हैं। बीते समय में नंदीग्राम, सिंगुर सरीखे आन्दोलनों में हमने देखा कि सत्ता, सरकार और उद्योगपतियों की जुगलबंदी ज्यादा ताकतवर हो गई है। जिससे आन्दोलनों को कुचलना आसान हो गया है। लेकिन हम इस युग को निराशा का युग नहीं मान सकते। समाज में धीरे धीरे अमीर गरीब के बीच की खाई और बढ़ रही है।ऐसे में जल्द ही समाज का अपने अधिकारों को मागने के लिए लनआन्दोलनों की ओर तो रुख करना ही होगा। इस तरह के आन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। चिपको आन्दोलन की प्रणेता गौरा देवी से लेकर वर्तमान में सूचना के अधिकार पर कार्यरत अरुणा राय और नर्मदा बचाओ आन्दोलन में मेधा पाटकर की सक्रियता से महिलाओं को प्रेरणा मिली है। आज देश भर में कई महिला आन्दोलन सक्रिय है जिनमें महिलाओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया है। हां जनआन्दोलनों की एक बड़ी कमी है कि उनमें महिलाओं की अगुआई बहुत कम देखने को मिलती है। महिला आन्दोलन तब तक चलते रहेंगे जबतक उन्हें बराबरी का हक नहीं मिल जाता। घरेलू हिंसा , महिला विधेयक जैसे मुददों पर तो राष्टीय स्तर पर बहसें हुई । स्वयं सहायता समूहों के रुप में महलाएं देश भर में अपने अधिकारों के लिये काम कर रही हैं। मीडिया जनआन्दोलनों पर हमेशा से मुखर रहा है। लकिन आज के दौर में उसे भी बाजार के अन्दर ही बसर करना है। मीडिया संस्थानों के मालिक जनआन्दोलनों के लिए मीडिया में स्पेस को खत्म करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन ऐसे कई पत्रकार हैं जो इन विषम परिस्थितियों में भी आन्दोलनों के साथ खड़े दिखाई देते हैं। मीडिया के हस्तक्षेप के बिना आन्दोलनों की धार को पैना कर पाना सम्भव भी नहीं है। जनआन्दोलनों की चर्चा करते हु2ए किसान आन्दोलनों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। चाहं भूमि सुधार हो या किसानों के अधिकारों की मांग, समय समय पर किसानों ने आन्दोलनों के जरिये अपने हक की लड़ाई जारी रखी है। भारतीय समाज की विशेषता जाति रही है। इसी कारण देश में जाति के नाम पर तो लोग आसानी से गोलबंद हो जाते हैं लेकिन पानी, बिजली, सड़क जैसे आम आदमी के मुददों पर लोगों को एकत्रित कर पाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में अवसरवादी नेता इस तरह के मुददों को जनता का मुददा बताकर राजनीति करने से नहीं चूकते। आज के बाजारवादी दौर में जैसी जनविरोधी स्थितियां पैदा हो रही हैं उनमें सुधार के लिये जनआन्दोलन ही अन्तिम विकल्प नजर आते हैं।

स्वामी अग्निवेश, संचालक आर्य समाज
मौजूदा समय में जन आन्दोलनों की भूमिका को आप किस रुप में देखते हैं?

आज के दौर में जनप्रतिनिधि एक बार चुनाव जीतने के बाद आम आदमी की सुध लेना भूल जाते हैं। अपनी सियासत को बर्करार रखने की जददोजहद के बीच वो उन लोगों के लिए समय नहीं निकाल पाते जो उन्हें वोट देकर जिताते हैं। दूसरी ओर रोजमर्रा की जिन्दगी में लोग कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। इन्हें आसानी से मिल सकने वाले अधिकारों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे में जनआन्दोलनों के जरिये ही उनकी समस्याओं की ओर ध्यान आकष्ट कराया जा सकता है। इसका मतलब ये नहीं है कि हर छोटी सी बात के लिए लोग आन्दोलन करने लगेंगे।
जनआन्दोलनों का स्वरुप कैसा होना चाहिए?
मेरा मानना है कि जनता द्वारा किये जाने वाले आन्दोलन शान्तिपूर्ण हासेने चाहिये। इनसे सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान नहीं होना चाहिये। लेकिन आम तौर पर देखने को मिलता है कि आन्दोलनकारी हिंसक हो जाते हैं। जब तक तोड़फोड़ या आगजनी की कुछ घटनाएं नहीं हो जाती तब तक वे अपने आन्दोलन को सफल नहीं मानते। इसके पीछे दाष मीडिया का भी है। मीडिया में उन्हीं आन्दोलनों को ज्यादा जगह दी जाती है जिनमें हिंसा की वारदातें होती हैं, टेनें रोकी जाती हैं या सड़के जाम कर दी जाती हैं। शान्तिपूर्ण तरीके से हो रहे आन्दोलनों को मीडिया अहमियत नहीं देता।
एक दौर था जब जब जनआन्दोलन आम आदमी की समस्याओं केा लेकर समय समय पर मुखर होते थे। लेकिन पिछले दषकों में जेपी ममेन्ट के बाद ऐसा कोई आन्दोलन दिखा नहीं जो राष्टव्यापी रहा हा?इसका कोई सीधा सा जवाब देना मुश्किल है। लेकिन जेपी आन्दोलन इन्दिरा गांधी की नीतियों से तंग आ चुकी जनता की आवाज थी। तत्कालीन कांग्रेस सरकार से छुटकारा पाना आम आदमी की जरुरत बन गई थी। ऐसे में जय प्रकाष ने युवाओं को गोलबंद किया और आन्दोलन ने राष्टव्यापी रुप ले लिया।आज ऐसे आन्दोलन खड़े नहीं हो पा रहे तो इसके पीछे कुशल नेतृत्वउ का भी अभाव है।
क्या आपका नहीं लगता कि मौजूदा आन्दोलन क्षेत्रीय स्तर पर ता सक्रिय हैं लेकिन राष्टी स्तर पर नहीं?स्थानीय स्तर पर तो देशभर में देश भर में आन्दोलन चल रहे हैं। जनजातीय समाज में भी आन्दोलन बड़े स्तर पर हो रहे हैं। देष भर में फैल रहे नक्सलवाद को भी एक बड़े आन्दोलन के रुप में देखना चाहिये। नक्सलवाद की उपज ही असन्तोष से हुई है। जब उन लोगों की समस्याओं को सुनने वाला कोई नही रहा ता मजबूरन उन्होंने हथियार उठा लिये।
सिंगुर, नंदीग्राम सरीखे आन्दोलनों में सरकार सत्ता और उद्योगपतियों की जुगलबंदी को आप किस रुप में देखते हैं? क्या आपको नहीं लगता कि इससे आम जनता के आन्दोलनों की धार कुंद हुई है?ये जुगलबंदी आन्दोलनों की सफलता के दृष्टिकोण से खतरनाक है। आये दिन आन्दोलनकारियों की मौत की खबरें आती हैं। उड़ीसा जैसे कड़वे उदाहरण हमारे सामने हैं। ऐसे में अपने अधिकारों के प्रति लड़ने की प्रवुत्ति का डगमगाना स्वाभाविक है।
जनआन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका को आप किस रुप में देखते है?
आन्दोलनों में महिलाओं ने समय समय पर उल्लेखनीय योगदान दिया है। हाल ही में उड़ीसा से कई लोगों का दल अपनी मांगों को लेकर दिल्ली आया था। इस दल में महिलाओं की संख्या को देखकर खुशी हुई। आन्दोलनों में महिलाओं की भागीदारी से उनके शान्तिपूर्ण होने की सम्भावना बढ़ जाती है क्योंकि महिलाएं स्वभाव से शान्तिप्रिय होती हैं।
आजकल जाति धर्म के नाम पर लोगों को गोलबंद करना आसान है, लेकिन पानी, बिजली, सड़क जैसी समस्याओं पर आन्दोलन खड़े करने में मुश्किल होती है। ऐसा क्यों?
जाति आज भी भारतीय समाज की सच्चाई है।ऐसे में जब बात आरक्षण जैसे मुददों की आती है तो वहां लोगों को निजी हित दिखाई देता है। सामाजिक समस्याओं के प्रति समझ विकसित होले के बाद ही लोग आन्दोलनों से जुड़ते हैं।
आज जैसी स्थितियां हैं उनमें जनआन्दोलनों के भविष्य को आप कैसे देखते हैं?आज आम आदमी की समस्याएं सुनने वाला कोई नहीं है।नेता निजी स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैैं। ऐसे में आम आदमी को सड़क पर उतरना ही पड़ेगा। आशा करनी चाहिये कि आने वाले समय में युवा वर्ग भी समाज की समस्याओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझेंगे।
राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप में प्रकाशित साक्षात्कारों पर आधारित

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nike dunk
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dr. devendra Shrivastava
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