ताज़ा रेजगारी

‘आईस-पाईस’ और ‘धप्पी’

फिर पिट्ठी में बस्ता रखके, 
इस्कूल को जाना मंगता है.
बाजू में प्याज दबा करके,
छुटटी का बहाना मंगता है…..

बरसात में कीचड़ के उपर,
फुटबाल खेलना मंगता है.
साईकिल का टायर हाथों से,
सड़कों पे ठेलना मंगता है…

वो सात पत्थरों का टावर,
कपड़े की बॉल से गिर जाना.
गुडडू की छत पे फिर एक शाम,
‘किंग-कौंग’ खेलना मंगता है…

फिर से किरकेट का टूर्नामेंट,
कस्बे में हंगामा कर दे.
‘हिप हिप हुर्रे’… ‘हिप हिप हुर्रे’,
का ढ़ोल बजाना मंगता है..

साल के सारे रंग मेरी,
पिचकारी में कोई भर दे.
होली के दिन वो नया नया,
कुर्ता पाजामा मंगता है…

पापा का झोला भर भर के,
घर में आतिशबाजी लाना.
बम और पटाकों से डर के,
फुलझड़ी जलाना मंगता है..

इस वक्त की ‘आईस पाइस’ ने,
जो बचपन मेरा छुपा लिया,
सर पे उसके धप्पी देके,
उसे फिर से बुलाना मंगता है…..

Comments

comments

Leave a Reply

2 Comments on "‘आईस-पाईस’ और ‘धप्पी’"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
rahul
Guest

bahut achha likhte hai sir aap, kafi dino se flow kr rha tha aapko sir.
sir bs isi trah likhte rhen.

wpDiscuz