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आँखें खोलने की नसीहत देती ‘आँखों देखी’

दो समानान्तर रेखाएं अनन्त पर मिलती हैं। बाउजी इस बात को मानने से इनकार देते हैं। दो समानान्तर रेखाएं अगर मिल गई तो वो समानान्तर हो ही नहीं सकती। बाउजी के लिये ऐसा कोई अनन्त नहीं बना जहां हम-आप अपनी सुविधा के लिये दो समानान्तर रेखाओं को मिला देते हैं। दरअसल बाउजी उस गणित को अपनी दुनियां से बेदखल करने की ठान चुके हैं जो किसी और के सच के हिसाब से अपने समीकरण तय करता है। वो गणित जो सूत्रों पे चलता है। वो सूत्र जिन्हें कभी कहीं कोई हमें रटा के चला गया और फिर जिनपर हमने कभी कोई सवाल ही नहीं किये। हमारी-आपकी जिन्दगी भी उसी गणित की तरह है जो एक ज़माने पुराने सूत्र पर चल रही है। वो सूत्र जो हमें ऐसी जीवनशैली रटाकर चले गये हैं जो हमें ऐसे अनन्त की ओर ले जा रहे हैं जिसका दरअसल कोई अस्तित्व ही नहीं है। और हम चले जा रहे हैं इसी भुलावे में कि हम वहां पहुंचकर किसी समानान्तर रेखा का छोर पकड़ पाएंगे। बाउजी मान चुके हैं कि ऐसा कभी नहीं होगा। कमसे कम उनका अपना सच तो उन्हें यही बताता है। आप उन्हें मूर्ख कह सकते हैं, पर वो अपने सच की तलाश में जिस दार्शनिक दुनिया में कदम रखते हैं उस दुनिया में उनके सहयात्री बनकर देखेंगे तो उन्हें मूर्ख कहना आपको खुद की मूर्खता लगेगी।

पुरानी दिल्ली के फतेहपुरी के उस छोटे से घर में रहने वाले बाउजी से उनकी पत्नी परेशान हैं। पर वो परेशानी बस ज़बान तक है। दिल उस परेशानी से अब तक अनछुआ है। बाउजी की बेटी रीता की अपनी एक रुमानी दुनिया है। वो एक लड़के से प्यार करती है। वही पुरानी दिल्ली वाला मासूम सा, नटखट सा प्यार। “मैं उसके बिना नहीं रह सकती“ कहकर फफक-फफक कर रो देने वाला प्यार। उसकी दुनिया को समझने के लिये उसके सच को समझने की ताब चाहिये। और वो ताब हर किसी के अपने-अपने सच में कहीं गुम सी गई सी है। वो है सबमें पर उसके इस्तेमाल की कुव्वत सबमें कहां ?

बाऊजी के भाइ रिषि चाचा उस मध्यवर्गीय चेतना के अहाते से बाहर न निकल पाने को मजबूर हैं जहां एक बिन्दु के बाद भाई को भाई से अलग हो जाना होता है। उसके मूल में बड़े परिवार की जिम्मेदारियां उठाने की ऊब है, पैसे की कमी है और पति-पत्नी के लिये पर्सनल स्पेस की कमी भी। और ऐसे में जब राजे बाऊजी नौकरी छोड़ने का फैसला कर देते हैं तो वो चेतना और हावी हो जाती है। राजे बाऊजी की नौकरी छोड़ने की वजह भी एक सामान्य सामाजिक बर्ताव के नज़रिये से अतरंगी लगती है। बतौर ट्रेवल एजेंट बाऊजी इस पशोपेश में है कि वो विदेश अब तक नहीं गये तो वो क्लाइंट को कैसे बता दें कि फलाइट कितने घंटों में गन्तव्य तक पहुंचेगी। अपने देखे सच को ही स्वीकारने की उनकी प्रतिज्ञा उनकी नौकरी के आड़े आ जाती है और वो ऐसे ही एक दिन नौकरी को अलविदा कहकर चले आते हैं।

उनकी पत्नी यानि अम्मा इस फैसले से दुखी हैं पर वो हमेशा की तरह अब भी बाऊजी के पक्ष में खड़ी हैं। मुंह से भले ही वो उन्हें लाख कोसें पर दिल उनसे दूर नहीं हो सकता। बाऊजी उदास से अपनी खटिया में बैठे अम्मा को साथ बैठने को कहेंगे तो वो पूछेगी ज़रुर कि क्या हुआ ? और फिर बाऊजी की मीठी चुहल कि बिना कुछ हुए साथ नहीं बैठ सकती क्या ? अम्मा और बाऊजी के बीच के गहरे अन्तर्सम्बंध को खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता। उसके लिये आंखें बंद करनी होंगी। रिश्तों की उस गहरी नदी में डूबते चले जाना होगा जहां प्यार का पानी की तरह कोई रंग नहीं है। उसकी रंगहीनता में छिपे रंग को देख पाना आपकी अपनी फितरत पर बहुत निर्भर करता है।

बाऊजी की मित्रमंडली एक छोटे शहर के उस मित्र समूह का ज़बरदस्त प्रतिनिधित्व करती है जिसमें एक खास तरह की फक्कड़ी का भाव है। जिसे एक वजह चाहिये जिसके इर्द गिर्द खाली समय के उस हिस्से को भरा जा सके जिसे अक्सर शहरी दुनिया में आभाशी दुनिया से भरा जाता है। बाऊजी उस समूह का आदर्श नेतृत्व हैं। मंडली के सदस्य उनकी टांग खिंचाई भी करते हैं, उन्हें सिरफिरा भी समझते हैं पर उनसे उनका एक खास सरोकार भी है। इसलिये मसखरी में ही सही वो बाऊजी के साथ रीता की शादी से ठीक पहले ये देखने के लिये चल पड़ते हैं कि क्या शेर सचमुच दहाड़ता है ?

रजत कपूर ने आंखों देखी के रुप में हिन्दी सिनेमा को वो समझ दी है जिसे समकालीन बाॅलिवुड सिनेमा के परिदृश्य में लुप्तप्राय होता हुआ देखा जा सकता है। वो समझ अतिसूक्ष्म मानवीय मूल्यों को देख पाने और उन्हें अहमियत दे पाने की समझ है। आंखों देखी एक ऐसा सिनेमाई लेंस है जिससे देखने पर हर इन्सान और उसकी सोच को समझ पाने की सूझ-बूझ हासिल की जा सकती है।

अपनी दार्शनिक दुनिया की तरफ कूच करता एक बुजुर्ग, परिवार और उसकी ज़रुरतों के अहाते में कैद एक निम्न मध्यवर्गीय औरत, उम्र की दहलीज़ को लांघकर रुमानियत की खूबसूरत दुनिया में सैर करना चाहती एक जवान लड़की, अपने अभावों से जूझते हुए एक संयुक्त परिवार की टूटन, भाइयों के बीच के अहम के बीच से उपजता एकांकीपन, फिल्म महज डेढ़ घंटों में बिना जल्दबाजी किये एक साथ मानवीय संबंधों की कई परतों जैसे खोलकर रख देती है।

एक अदाकार के रुप में संजय मिस्रा की काबिलियत भारतीय सिने संसार से छिपी नहीं है। पर आंखों देखी में उनका मौन भी इतनी गहराई से बोलता है कि विचार शब्दों के मोहताज़ नहीं रह जाते। रजत कपूर हमेशा की तरह एक गम्भीर किरदार को बहुत सहज तरीके से पेश करते हैं। उनकी खासियत यही है कि वो हर फिल्म में एक ही तरह की भूमिकाएं करते हुए भी अलग नज़र आते हैं। अम्ममा के रुप में सीमा पाहवा भी अपनी ओर ध्यान खींचती हैं। खासकर अपनी बेटी के प्रेमी को “ ‘अरे भैया’ तुम जाओ अभी“ कहकर जब वो घर से निकालती हैं तो उनकी अदाकारी में एक खास किस्म की सहजता और समझदारी का बोध होता है।

अगर सिनेमा देखना आपको अच्छी किताब पढ़ लेने सा अहसास देता है तो आंखों देखी आपको अपनी पढ़ी हुई सबसे अच्छी किताबों में शुमार करने लायक फिल्म लगेगी। ये एक दर्शक के रुप में मेरा सच है। बाऊजी की तर्ज पर मैं भी आपको अपने सच को खुद ही तलाशने का मशविरा दूंगा।

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1 Comment on "आँखें खोलने की नसीहत देती ‘आँखों देखी’"

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Kumar Harsh
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ये ‘आँखों देखी’ तो अब यू लग रही है की जैसे मैंने अपनी खुद की आँखों से देखी हो.
कभी मौका मिला तो यह ‘आँखों देखी’ जरूर देखूगा.

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