ताज़ा रेजगारी

अफवाहें गढ़ती वर्चुअल दुनिया

फेसबुक जैसी नेटवर्किंग सार्इट पर फैली अफवाह ने बैंग्लौर से लगभग 3 हज़ार उत्तर भारतीय लोगों को अपने अपने घरों की ओर जाने को मजबूर कर दिया। इस घटना ने एक अजीब सा डर पैदा किया है जिसे आपसे साझा कर रहा हूं।

इन दिनों इन्टरनेट के सामने बैठे बैठे अक्सर मैं सोचता हूं कि कहीं हमें दरवाजों में बंद होने की आदत तो नहीं हो रही? कभी कभी  लगता है कि मेरे आस पास कर्इ किस्म के दरवाजे हैं जो बंद रहते हैं। खिडकियां जो कभी नहीं खुलती। कर्इ बार लगता है कि हम मुंह से ज्यादा उंगलियों से बात करने लगे हैं। उंगलियां जबान की तरह चलने लगी हैं और होंठ खामोश रहने लगे हैं।

मेरी आंखों के सामने खुली नेटवर्किंग वैब्सार्इटस की खिड़कियों में सैकड़ों लोग मेरे सामने होते हैं लेकिन फिर भी हमेशा ऐंसा ही लगता है कि ये लोग बहुत दूर हैं और इनका पास होना एक भ्रम है। उस समय मुझे डर लगने लगता है। वो सारी बातें झूठ लगने लगती हैं जो उंगलियों ने अभी अभी ना जाने कितने लोगों से कही और मेरी आंखों ने सुनी हैं। मैं डर जाता हूं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरी आखों के सामने मेरे सैकड़ों दोस्तों की ये आभासी जमात एक कोरा झूठ है। और एक दिन  मैं इनके साथ जीता हुआ महसूस करने  लगूंगा कि मैं कितना अकेला हूं।

कहना सुनना लिखने और पढ़ने में तब्दील होने लगा है और आवाज……आवाज तो जैसे कानों में बहनी ही बंद हो गर्इ है।  अपनों की बातों की एक मीठी नदी जो अब कानों में नहीं बहती। दोस्त बढ़ते जा रहे हैं पर मिलना जुलना बंद होता जा रहा है। ये सब कुछ कर्इ बार बड़ा रुखा सूखा सा लगने लगता है। हम कुछ भी कह जाने लगे हैं क्योंकि सामने वाला क्या कहेगा क्या सोचेगा इसकी फिक्र होनी अब बंद हो गर्इ है। वो क्या लिखेगा ये उतना मायने नहीं रखता क्योंकि अन्ततह उस लिखावट की वर्चुअल उपसिथति सार्इन आउट भर कर देने पे नेस्तनाबूत हो जायेगी। उसका होना न होने में बदल जायेगा। फिर जो लिखकर कहा गया था वो शून्य हो जायेगा।

मुझे शंका है कि लिखते लिखते लोगों के करीब चले जाने की ये आदत बहुत खतरनाक साबित हो सकती है। हमारे शब्द हमें लोगों के बेहद निजी और नितान्त व्यकितगत संसार में पहुचा देने का भ्रम पैदा करने लगे हैं। हमारा मानवीय असितत्व विन्डोज़ के किसी सार्इडबार में में मौजूद चैट लिस्ट के एक कोने में चस्पा किया जाने लगा है। मुझे डर है एक दिन जब मैं वहां नहीं रहूंगा तो मान लिया जायेगा कि मैं कहीं नहीं हूं। हो सकता है कि लोग कुछ दिनों मुझे र्इमेल या स्क्रैप भेजकर जानना चाहेंगे कि मैं हूं भी कि नहीं, ज्यादा हुआ तो मेरी दीवार पे कुछ लिख दिया जायेगा। कम बैक, मिस यू, टी सी या ऐसे ही छुटपुट दो शब्द। मैं इन दो शब्दों के जवाब में दो शब्द नहीं लिखूंगा और कहीं का नहीं रह जाउंगा। कुछ लोग शायद कुछ दिन चिंता करेंगे और फिर भूल जायेंगे क्योंकि चिन्ता करने से बेहतर वो अपनी फ्रेंडलिस्ट में मौजूद सैकड़ों लोगों से रुबरु होना पसंद करेंगे। क्योंकि लोगों के पास अपने लिये इतना कम समय है कि चिन्ता करने जैसी चीजें उनके लिये सबसे निचली वरियता में रहेंगी। और निचली वरियता की चीजों का महत्व इस दौर में बिल्कुल खत्म हो गया है।
अभी कुछ ही दिनों महीनों मेरे एक दोस्त के औकर्ुट अकाउंट से उसकी फ्रेंडलिस्ट के लगभग 250 लोगों को एक बेहद अश्लील कहा जा सकने वाले सेक्स टेप का वीडियो भेजा गया। उस अकाउंट में उसका नाम था। उसकी तस्वीर थी। माने उसने ही लगभग ढ़ार्इ सौ लोगों को ये सेक्स टेप भेजा था। उसने बताया कि मैने ऐसी कोर्इ चीज लोगों को भेजी ये मुझे भी तब पता चला जब मेरे भार्इ का मुझे फोन आया और उसने ये कहा कि तुम्हारा अकाउंट किसी ने हैक कर लिया है। भार्इ ने ये कहा क्योंकि वो जानता था कि मैने इस तरह की कोर्इ अश्लील सामाग्री उसे नहीं भेजी हो सकती। लेकिन वहीं मेरी एक पुरानी दोस्त ने उस स्क्रैप पर रिप्लार्इ किया कि तुम्हें क्या हो गया है। ठीक तो हो? ये क्या क्या भेजने लगे हो?एक अन्य अन्जान ने जिसकी फ्रेंड रिक्वेस्ट को मैने बिना ये जाने एक्सेप्ट कर लिया था कि वो कौन है, ने मुझे लिखा रिमूव द पोस्ट अदरवार्इज आर्इ विल कौल सार्इबर पुलिस। फिर मेरे भतीजे का फोन आया कि चाचा आपके अकाउंट से एक बड़ी गंदी चीज आर्इ है। तब तक उसे पता चल चुका था कि वो चीज आंखिर है क्या। एक ऐसी जीच जो उसने कभी भेजी ही नहीं, उसके नाम से ढ़ार्इ सौ लोगों को भेज दी गर्इ और उनमें से लगभग सौ लोगों के लिये वो बदल गया। पर अपने लिये उनकी राय बदल जाने के कारणों में वो खुद कहीं नहीं था।

यही एक डर की सिथति है। कि हम कैसे दिखतें हैं, कैसा सोचते हैं वगैरह  इस बात से तय होने लगा है कि हमारा प्रोफार्इल हमें कैसे पोर्टे करता है। एक दिन जब हमारे बदले कोर्इ और हमारे प्रोफार्इल को मैनेज करने लगेगा, वो जिसे अन्दाजा होगा कि हम लगभग किस तरह के दिखते हैं, किन लोगों को जानते हैं। इतना काफी होगा और हमारा किसी और के द्वारा गढ़ा गया आभासी रुप लोगों के  लिये सच हो जायेगा। क्योंकि तब जो वर्चुअल होगा वो रियल समझ लिया जायेगा।

इस बीच बैंग्लोर में रह रहे उत्तर भारतीयों में जो डर फैला वो किसी न किसी रुप में हम सब के बीच पसर जाएगा। ये वाकया शायद सचेत हो जाने का संकेत है। सार्इबर दुनिया पर अपनी निर्भरता को कम करने का एक सिग्नल शायद।

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