ताज़ा रेजगारी

अगर क़ुतुब मीनार के पंख होते

qutub Minar

फोटो: उमेश पन्त

महरोली टर्मिनल से वो टूटी फूटी सड़क
जाती है क़ुतुब मीनार की ओर
ऐसे जैसे कोई गांव का बच्चा
धूल-धूसरित कपड़े पहने जा रहा हो दिल्ली देखने
अपने हाथ में पकड़े इतिहास की कोई फटी पुरानी किताब
दूर आकाश में बहुत ऊंचाई से
क़ुतुब मीनार देखती है उस उपेक्षित सड़क को
जैसे नौकरी के लिए कहीं दूर रह रही मां
अपनी आंखों में बना रही हो अपने बच्चे का काल्पनिक चित्र
बिखरे हुए हैं चारों तरफ चुनावी पर्चे
और पर्चों में झूट की तरह  चिपके हैं विकास के वादे
हवा में गूँज रही चुनावी घोषणाओं में धूल लिपटी हुई है
जो सांसों को कर रही है और ज्यादा भारी
और इस धूल, उपेक्षा, टूटन, अव्यवस्था के बीच
लोग जी रहे हैं अपने ही समय को
जैसे देख रहे हों इतिहास को
जिसे बदला नहीं जा सकता
बस देखा जा सकता है बेबसी के साथ
और दूर आकाश में सदियों से टिकी है क़ुतुब मीनार
सोचती हुई कि काश उसके पास भी पंख होते
और ये सब देखने से पहले
वो उड़ सकती इस सबसे कहीं दूर
उस कबूतर के साथ जो अभी अभी उसके गुम्बद  पर बैठा हुआ था

Comments

comments

Leave a Reply

1 Comment on "अगर क़ुतुब मीनार के पंख होते"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
kavita rawat
Guest

और इस धूल, उपेक्षा, टूटन, अव्यवस्था के बीच
लोग जी रहे हैं अपने ही समय को
जैसे देख रहे हों इतिहास को
जिसे बदला नहीं जा सकता
बस देखा जा सकता है बेबसी के साथ
………….
समय एक जैसा कभी नहीं रहता …
बहुत सुन्दर अनुपम कृति

wpDiscuz